बकरियाँ चराने वाले बालक से पद्म श्री तक अलगोजा के सुरों में बसी तगाराम भील की संघर्षगाथा

जैसलमेर की स्वर्ण नगरी के मूलसागर गांव से निकलकर दुनिया के मंचों तक अलगोजा की मधुर सुर-लहरियां बिखेरने वाले प्रसिद्ध लोक वादक तगाराम भील को कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है. बचपन में अभावों के बीच बकरियां चराने और जंगलों में चोरी-छुपे रियाज़ करने वाले तगाराम ने अपनी साधना से अलगोजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. वर्ष 1981 में पहली बार मंच पर प्रस्तुति देने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब तक 35 से अधिक देशों में राजस्थान की लोकसंस्कृति का परचम लहराया है.

बकरियाँ चराने वाले बालक से पद्म श्री तक अलगोजा के सुरों में बसी तगाराम भील की संघर्षगाथा