सरकारी स्कूल के प्राचार्य की बात चुभी तो गरीब बच्चों के लिए खड़ा कर दिया गुरुकुल जानें अशोक बोहने की कहानी
सरकारी स्कूल के प्राचार्य की बात चुभी तो गरीब बच्चों के लिए खड़ा कर दिया गुरुकुल जानें अशोक बोहने की कहानी
Balaghat News: मध्य प्रदेश के बालाघाट के देवटोला में माध्यमिक गुरुकुल स्कूल का संचालन करने वाले अशोक बोहने गरीब बच्चों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं. दरअसल वह पिछले दो दशक से बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं. आइए जानें सबकुछ.
रिपोर्ट:चितरंजन नेरकर
बालाघाट. व्यक्ति अपने कर्म और त्याग से महान होता है. अगर यह महानता बच्चों में ज्ञान, शिक्षा की अलख जलाने के लिए हो तो देश के बेहतर भविष्य की तस्वीर उभर कर सामने आती है. खुद मोहताज रहकर भी बालाघाट का एक शख्स बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने के लिए संघर्षों का वो चिराग साबित हो रहा है, जो पिछले दो दशक से अपने सहयोगी शिक्षकों के साथ हजारों बच्चों की तकदीर लिख चुका है. यही नहीं,आज भी अभाव ग्रस्त जीवन बिताकर यह शख्स बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का काम कर रहा है. यह स्कूल नर्सरी से कक्षा आठवीं तक है.
बालाघाट के वार्ड नंबर 4 देवटोला में गुरुकुल स्कूल चलाने वाले शख्स अशोक बोहने का यह संघर्ष बड़ा दिलचस्प है. निःशुल्क शिक्षा और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए किया जा रहा उनका प्रयास एक मिसाल है, वो भी ऐसे वक्त में जब अधिकांश लोगों के लिए शिक्षा व्यवसाय का जरिया बनकर रह गया है.
अशोक बोहने को यह बात चुभ गई थी
माध्यमिक गुरुकुल स्कूल कई गांवों के बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहा है. इस गुरुकुल स्कूल के शुरू होने का वाकया भी बड़ा दिलचस्प है. बात लगभग दो दशक पूर्व की है, तब वार्ड नंबर 4 गांव हुआ करता था. उस समय यहां शासकीय प्राथमिक शाला में अध्यनरत इलाके के सभी 25 छात्र फेल हो गए. अशोक बोहने उस वक्त कॉलेज में पढ़ने वाले युवा थे. जब उन्होंने बच्चों के फेल होने के विषय में शासकीय स्कूल के प्राचार्य से सवाल पूछा, तो उनका कहना था कि इन मूर्खों बच्चोंको ब्रह्मा जी भी खुद आकर पढ़ाएं तो भी ये पास नहीं हो सकते. गांव के बच्चों के बारे में इतनी अपमानजनक बात सुनकर अशोक बोहने ने उसी समय फैसला कर लिया कि अब वे खुद बच्चों को पढ़ाकर उन्हें पास करवाएंगे.
बरगद के नीचे शुरू हुआ था गुरुकुल
फेल होने वाले छात्रों को लेकर अशोक गांव के ही बरगद के पेड़ के नीचे गुरुकुल स्कूल की कल्पना कर उन्हें पढ़ाने लगे. इच्छाशक्ति और मेहनत का नतीजा ये रहा कि अगले सत्र की परीक्षा में वे सभी छात्र पास हो गए. यह परिणाम इलाके के लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था. लोगों से प्रोत्साहन मिला और उनके सहयोग से यहां किराए के कच्चे मकान में गुरुकुल स्कूल की नींव रखी गई.
अभाव में प्रभाव की शानदार मिसाल
गुरुकुल स्कूल के शुरू होने के साथ ही संघर्षों का वो सफर भी शुरू हुआ जो आज अभाव में प्रभाव देने वाली निःशुल्क शिक्षा की शानदार मिसाल है. यहां पढ़ाने वाले शिक्षक भी पूरी तरह समर्पित हैं, जो निःशुल्क शिक्षा देने के मिशन में कई वर्षों लगे हुए हैं.वह इसके लिए कोई मानदेय नहीं लेते हैं. यहां शिक्षा के साथ हर विधा में बच्चों को पारंगत करने के प्रयास किया जा रहा है. आधुनिक तकनीक और कम्प्यूटर में भी दक्ष किया जा रहा है. दरअसल पहली क्लास से ही बच्चे कम्प्यूटर का बेसिक ज्ञान हासिल कर रहे हैं. गुरुकुल स्कूल में पढ़ाई के स्तर का अंदाजा इसी बात से लगा सकते है कि यहां के बच्चों को दूसरा कोई स्कूल रास नहीं आता. कुछ बच्चे यहां से नाम कटवाकर नामी-गिरामी स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ने तो गए, लेकिन वहां की पढ़ाई रास नहीं आई तो कुछ ही दिनों में लौटकर गुरुकुल की शरण ले ली.
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Tags: Education news, Mp news, Positive StoryFIRST PUBLISHED : September 21, 2022, 11:39 IST