Opinion : कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ियों में है बड़ा अंतर अमित शाह भी साफ कर चुके हैं अपना नजरिया
Opinion : कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ियों में है बड़ा अंतर अमित शाह भी साफ कर चुके हैं अपना नजरिया
कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ी, दोनों चीजों में मूल रूप से फर्क है, भारत सरकार की कथित फ्रीबीज जैसे, किसी को घर देना, किसी को गैस का कनेक्शन देना, किसी के घर में बिजली पहुंचाना, किसी को आयुष्मान भारत का कार्ड देना, कोरोना के बाद फ्री राशन देना. किसी को बिजली देना रेवड़ियां बांटना नहीं है लेकिन बिजली का बिल ना देना रेवड़ियां बांटना है.
दफ्तर में मेरे 2 सहकर्मी जोरदार तर्क-वितर्क में मशगूल थे. उनकी तेज-तेज आवाज मेरी सीट तक आ रही थी. सोचा क्यों ना इनके पास जाकर ही समझा जाए कि इनकी बहस का मुद्दा है क्या? दोनों के तर्क क्या हैं? मैं उठकर दोनों के पास पहुंचा, पूछा- क्या हो गया, दोनों बहुत गरम लग रहे हो? किस बात पर बहस चल रही है? उनमें से एक ने कहा- बताइए, केंद्र सरकार जो मुफ्त राशन दे रही है, वो रेवड़ी कल्चर वाली राजनीति कैसे हो गई? क्या सरकार कोरोना काल में लोगों को भूखे मरने के लिए छोड़ देती? गरीबों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मुफ्त इलाज, फ्रीबीज कैसे है? बच्चों को मुफ्त में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था कई दशकों से चली आ रही है, फिर ये मुफ्त की सियासत क्यों हो गई?
लोगों को एलपीजी गैस का कनेक्शन उपलब्ध करवाकर उन्हें धुएं से आजादी दिलाना, राजनीतिक हित साधना कैसे हो गया? रेवड़ी कल्चर वाली राजनीति तो ये लोग कर रहे हैं, जो सुविधा संपन्न लोगों को भी मुफ्त में सुविधाएं बांटकर उन्हें मुफ्तखोरी की आदत लगा रहे हैं, उसका इशारा दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार की तरफ था. उसने आगे कहा- बताइए, 200 यूनिट बिजली और 20 हज़ार लीटर पानी आप फ्री में दे रहे हैं. जबकि, इस सुविधा का लाभ उठाने वाले लाखों लोग सक्षम हैं, वो अपना बिजली का बिल चुका सकते हैं, पानी खर्च करने के पैसे दे सकते हैं. फिर भी आप टैक्स पेयर्स के पैसों से अपने राजनीतिक हित साध रहे हैं.
कल्याणकारी योजना और मुफ्त की सौगात में फर्क
अपनी बातों को और पुख्ता करने के लिए उसने मुझसे कहा- आप अमित शाह को सुन लीजिए. आप भी समझ जाएंगे कि कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की सुविधाओं में फर्क क्या होता है? दरअसल, 14 नवंबर को अहमदाबाद में नेटवर्क 18 के एडिटर इन चीफ राहुल जोशी को दिए गए इंटरव्यू में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था- ‘कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ी, दोनों चीजों में मूल रूप से फर्क है, भारत सरकार की कथित फ्रीबीज जैसे, किसी को घर देना, किसी को गैस का कनेक्शन देना, किसी के घर में बिजली पहुंचाना, किसी को आयुष्मान भारत का कार्ड देना, कोरोना के बाद फ्री राशन देना. किसी को बिजली देना रेवड़ियां बांटना नहीं है लेकिन बिजली का बिल ना देना रेवड़ियां बांटना है. किसी को घर देना उसके जीवन स्तर को ऊपर लाने की कोशिश है, हम वही कोशिश कर रहे हैं. हम घर दे रहे हैं, लेकिन घर का टैक्स माफ नहीं करते हैं. जहां तक मुफ्त में अनाज देने की बात है, तो पूरी दुनिया जानती है कि कोरोना के स्लोडाउन का सबसे ज्यादा असर अगर किसी पर पड़ा है तो देश के गरीब तबके लोगों पर पड़ा है. समाज का कोई भी तबका अगर किसी प्राकृतिक आपदा या महामारी की वजह से प्रभावित होता है तो सरकार की ये नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो उस तबके की मदद करे. ये मदद फ्रीबीज नहीं है.’
‘मुफ्त की सौगात’ का इतिहास
मुफ्त की सौगात यानी फ्रीबीज पर इतनी बहस क्यों हो रही है, इसपर चर्चा आगे करेंगे, लेकिन उससे पहले यहां ये समझना जरूरी है कि फ्रीबीज है क्या, देश की राजनीति में इसकी अहमियत क्या है और इसकी शुरुआत कब और कहां से हुई? तो समझिए, चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियां प्रचार के दौरान तरह-तरह के वादे करती हैं. कोई कहता है, सरकार में आने पर बच्चियों को मुफ्त साइकिल बांटेंगे, छात्रों को मुफ्त में टैबलेट या लैपटॉप देंगे. महिलाओं के लिए साड़ियों और धोतियों के वादे किए जाते हैं. चुनाव से जनता के टैक्स से बने सरकारी खजाने को निजी संपत्ति समझकर मनचाही सौगात बांटने का ये ऐलान ही मुफ्त की सौगात वाली राजनीति है. राजनीतिक दलों की ये प्रवृति लोकतंत्र को रिश्वतखोरी तंत्र में बदलने की एक कोशिश है, जो ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां इस दौर में कर रही हैं और सत्ता सुख पाने में कामयाब भी हो रही हैं. आज़ाद भारत में रेवड़ी कल्चर वाली राजनीति की शुरुआत दक्षिण भारत से मानी जा सकती है. तमिलनाडु में मुफ्त भोजन, रियायती दर पर भोजन, मुफ्त में साड़ी और धोती, फ्री में टीवी बांटने का वादा. इस तरह के वादों में एक-दूसरे से प्रतियोगिता कर डीएमके और एआईएडीएमके ने कई बार सरकारें बनाईं. इसका असर, दूसरे दक्षिण भारतीय राज्यों पर भी पड़ा.
सबसे पहले आंध्र प्रदेश में 1982 में अभिनेता से नेता बने एनटीआर की TDP के उभरने के बाद महिलाओं को मुफ्त साड़ी से लेकर 2 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर चावल तक देने के वादे किए गए. तमिलनाडु से शुरू हुआ ये कल्चर अब देश भर में और हर राजनीतिक दल में घर कर चुका है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार तो चल इसी मुफ्त की सौगात वाले वादों पर रही है. चुनावों में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्लीवालों के लिए हर महीने 200 यूनिट बिजली और 20 हज़ार लीटर पानी फ्री देने के वादे पर ही प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनाई. लंबे समय तक दिल्लीवालों ने मुफ्त बिजली और पानी का फायदा भी उठाया. हालांकि, अब इसके लिए आवेदन मंगाए जा रहे हैं यानी जो लोग आवेदन करेंगे, मुफ्त बिजली और पानी योजना का लाभ उन्हें ही मिलेगा.
आम आदमी पार्टी ने तो मौजूदा गुजरात चुनाव में भी 300 यूनिट फ्री बिजली, महिलाओं के लिए 1000 रुपये प्रतिमाह, बेरोजगारों के लिए 3000 रुपये प्रतिमाह का भत्ता और किसानों के लिए 2 लाख रुपये तक की कर्जमाफी का ऐलान किया है. इसी तरह उत्तर प्रदेश में 2012 में समाजवादी पार्टी ने मुफ्त लैपटॉप और साइकिल का वादा किया, बहुमत वाली सरकार बनी तो नए-नए मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव ने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप और साइकिल बांटी भी. बिहार में अलग-अलग गठबंधन के साथ सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी स्कूली छात्रों को मुफ्त साइकिल बांटी. आज के दौर में कोई भी राज्य हो या फिर कोई भी पार्टी हो खासतौर पर क्षेत्रीय पार्टियां, कोई भी मुफ्त की सौगात का ऐलान करने में पीछे नहीं है. एक तरह से कहें तो वोटर्स को रिश्वत देने में पीछे नहीं है. कई ऐसे राज्य हैं जहां राजनीतिक पार्टियां मुफ्त सौगात वाले वादों पर सत्ता में काबिज हुईं लेकिन खजाने खाली हो गए और सरकारें कर्ज में डूब गईं.
प्रधानमंत्री ने छेड़ी नई बहस
दरअसल, ‘मुफ्त की सौगात’ वाली राजनीति पर ये बहस 16 जुलाई के बाद और तेज हो गई है. 16 जुलाई को उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेवड़ी कल्चर और इसको बढ़ावा देने वालों पर करारा प्रहार किया था. पीएम मोदी ने कहा था ‘रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए बेहद घातक है. मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट बटोरने की भरसक कोशिश हो रही है. इससे देश के युवाओं को बहुत सावधान रहने की जरूरत है. रेवड़ी कल्चर वाले कभी नए एक्सप्रेस-वे नहीं बनाएंगे. उन्हें लगता है कि जनता को रेवड़ी बांटकर खरीद लेंगे. लेकिन हमें रेवड़ी कल्चर को देश की राजनीति से हटाना है.’ यहां रेवड़ी शब्द से प्रधानमंत्री का मतलब उन योजनाओं, सुविधाओं और सब्सिडी से था, जो राजनीतिक दल वोटर्स को लुभाने के लिए देते हैं.
मुफ्त की सौगात दिवालियापन को आमंत्रण
प्रधानमंत्री के बयान के बाद ‘मुफ्त की सौगात’ वाली राजनीति पर नई बहस छिड़ी. मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका के तौर पर था. अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने मुफ्त की सौगात पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका को 3 सदस्यीय पीठ को भेजा था. मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने ऐसा करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी भी की थी, बेंच ने कहा था- ‘ये मुफ्त की सुविधाएं आगे चलकर सरकार को दिवालियापन की ओर धकेल सकती हैं, जिसकी वजह से सरकार फंड की कमी का हवाला देते हुए बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा सकेगी.’
आयोग के पास रोकने का अधिकार नहीं
चुनाव आयोग पहले ही कोर्ट में एक हलफनामे के जरिए ये साफ कर चुका है कि उसके पास ऐसा कोई नियम या कानूनी अधिकार नहीं है जिससे वो राजनीतिक दलों को मुफ्त की सौगात वाली योजनाओं का ऐलान करने से रोक सके. हालांकि, चुनाव आयोग ने मुफ्त चुनावी वादों को लेकर राजनीतिक दलों के सामने आदर्श आचार संहिता में संशोधन का एक प्रस्ताव भी रखा था. इसमें आयोग ने पार्टियों से पूछा कि अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए उनके पास कितनी वित्तीय क्षमता है, इसकी जानकारी वोटर्स को दे पाएंगे? आयोग ने सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों और क्षेत्रीय पार्टियों को चिट्ठी लिखकर 19 अक्टूबर तक जवाब मांगा था, लेकिन कुछ पार्टियों को छोड़कर ज्यादातर दलों ने आयोग को कोई जवाब नहीं दिया.
बीजेपी ने आयोग को भेजे अपने जवाब में कहा कि मुफ्त सौगात वोटर्स को लुभाने के लिए होती है जबकि कल्याणवाद एक नीति है जिसमें वोटर्स का विकास किया जाता है. माना जा रहा है कि बीजेपी को चुनाव आयोग की इस राय से कोई ऐतराज नहीं है कि राजनीतिक दलों को अपने चुनावी वादों में वित्तीय व्यावहार्यता भी बतानी चाहिए. बीजेपी का मानना है कि राजनीतिक पार्टियों को अपना फोकस सरकारों पर वोटर्स की निर्भरता को बढ़ाने की बजाय उनके सशक्तिकरण और क्षमता को विकसित करने पर होना चाहिए. जैसा कि खुद प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर कह चुके हैं. अहमदाबाद वाले इंटरव्यू में गृह मंत्री अमित शाह का तर्क भी कुछ इसी दिशा में है. हालांकि, कई दलों ने तो आयोग के अधिकार क्षेत्र पर ही सवाल उठा दिए हैं. उनकी दलील है कि वोटर्स को किस वादे पर भरोसा करना चाहिए और किस वादे पर नहीं, ये तय करना वोटर्स का विशेषाधिकार है. कांग्रेस का तर्क है कि चुनावी वादे पूरे करना राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है.
मुफ्त की सौगात पर CAG भी चिंतित
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग तो मुफ्त की रेवड़ी कल्चर पर रोक लगाने की दिशा में कोशिशें तो कर ही रहे हैं. अब कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) भी रेवड़ी कल्चर पर रेड सिग्नल लगाने की दिशा में सोच रहा है. सूत्रों के मुताबिक CAG इस बात पर विचार कर रहा है कि कुछ ऐसे मानक तय किए जाएं जो सब्सिडी, डिस्काइंट, राइट-ऑफ और ऑफ-बजट जैसे उधार के बोझ को खत्म कर सकें. CAG अगले कुछ सालों में राज्यों की रिपेमेंट लायबिलिटी पर भी गौर कर रहा है. सूत्र बताते हैं कि अधिकतर राज्यों में जो असल परेशानी आएगी वो रिपेमेंट की होगी यानी राज्यों ने जो कुछ भी उधार लिया है, उसका वापस भुगतान करना एक बड़ा बोझ साबित होगा, क्योंकि उनके बजट का ज्यादा हिस्सा तो सिर्फ चुकाने में चला जाएगा.
यूं तो राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र या लोकलुभावन वादे तो व्यापक चर्चा-बहस का विषय हैं. कल्याणकारी योजना और मुफ्त की सौगात का भी व्यापक विश्लेषण हो सकता है. हो सकता जो सामान या योजना हमारे लिए मुफ्त की सौगात हो वो किसी दूसरे के लिए कल्याणकारी योजना साबित हो सकती है. ठीक इसी तरह हमारे लिए कल्याणकारी योजनाएं किसी और के लिए मुफ्त की सौगात साबित हो सकती है. हालांकि, इस पूरी बहस को इस तर्क पर नहीं छोड़ा जा सकता है. जब तक सरकार, सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग से इसको लेकर कोई ठोस कानून, रणनीति या नियम नहीं बनाया जाता है, तब तक कौन सी योजना कल्याणकारी है और कौन सी मुफ्त की सौगात या रेवड़ी कल्चर वाली राजनीति, ये फैसला हम वोटर्स को ही करना होगा. वोटर्स खुद तय करें और फिर अपने विवेक से फैसला लें.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए up24x7news.comHindi उत्तरदायी नहीं है.)
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Tags: Free electricity, Free RationFIRST PUBLISHED : November 21, 2022, 11:03 IST