9 साल की उम्र से बच्चों को पढ़ा रहे मिलिए दुनिया के सबसे कम उम्र के “हेडमास्टर”से!
9 साल की उम्र से बच्चों को पढ़ा रहे मिलिए दुनिया के सबसे कम उम्र के “हेडमास्टर”से!
बाबर अली 9 साल की उम्र से बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को पढ़ा रहे हैं. आनंद शिक्षा निकेतन नाम से स्कूल चलाते हैं. उनके स्कूल में बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है.
भारत पुरातनकाल में विश्वगुरु रहा है. यहां नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे. जहां सुदूर देशों से विद्यार्थी विभिन्न विषयों की शिक्षा लेने आया करते थे. लेकिन आक्रमणकारियों ने इन विश्वविद्यालयों को ध्वस्त कर दिया. बीतते समय के साथ कई परिवर्तन हुए और आज हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. इसी क्रम में एक बच्चे ने अपना योगदान देना शुरू किया. उसने 9 साल की उम्र में ही अपने साथी छात्रों को पढ़ाना शुरू कर दिया.
किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले बाबर अली आज दुनिया के सबसे कम उम्र के हेडमास्टर माने जाते हैं. 29 साल के बाबर अली की 9 साल की उम्र से शिक्षक बनने की कहानी लेकर आए हैं. जो आज आनंद शिक्षा निकेतन स्कूल चला रहे हैं, साथ ही बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे हैं.
5 वीं में पढ़ते थे तब अपनी बहन समेत 8 बच्चों को पढ़ाना शुरु किया.
कैसे पढ़ाना शुरू किया
बाबर अली पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के रहने वाले हैं. वह बताते हैं, “मैं साल 2002 में 5वीं क्लास में पढ़ता था. मेरा स्कूल घर से 10 किमी दूर था. स्कूल से लौटकर मैं अपनी छोटी बहन अमीना को पढ़ाता था.” उन्होंने देखा कि उनकी उम्र के बाकी दोस्त गरीबी और काम के चलते पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने उन दोस्तों को खुद पढ़ाने का निश्चय किया. इस तरह उन्होंने 8 बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. वो स्कूल से जो भी पढ़कर आते शाम को अपनी पाठशाला में साथी बच्चों को पढ़ाया करते.
बाबर कहते हैं, “मैंने यह महसूस किया कि मैं तो शिक्षा ले पा रहा हूं, लेकिन मेरी ही उम्र के बाकी कई बच्चे हैं जो पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं. कोई बीड़ी बनाने का काम करता है तो कोई दूसरा काम करता है. गरीबी के कारण सबको काम करना पड़ता है. लड़कियां घर के कामों में हाथ बंटाती रहती हैं. इन कारणों के चलते मैंने बच्चों को पढ़ाने की शुरुआत की.”
साल 2016 में आनंद शिक्षा निकेतन की शुरुआत की.
13 सालों में बन पाया स्कूल
बाबर अली बताते हैं कि साल 2002 से लेकर 2015 तक हमने अपने घर में ही स्कूल चलाया. उन्होंने घर के सामने की खाली जगह में ही ब्लैक बोर्ड लगाकर बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. शुरुआत में स्कूल से जब वो बची हुई चॉक इकट्ठी करके लाते थे तो शिक्षकों को लगता था कि ये इतनी चॉक का क्या करता है. अपने साथ इतनी चॉक क्यों ले जाता है. लेकिन जब टीचर्स को ये पता चला कि बाबर बच्चों को पढ़ाते हैं तो स्कूल टीचर्स ने उन्हें हर हफ्ते एक चॉक का डब्बा देना शुरू कर दिया. फिर जब धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि बाबर मुफ्त में बच्चों को पढ़ा रहे हैं तो लोगों ने उनकी मदद करनी चाही और कुछ लोगों ने टीनशेड लगवा दिया. जिससे कि बच्चों को बारिश के समय में भी आसानी से पढ़ाया जा सके.
वो बताते हैं कि धीरे-धीरे मुझे कई लोगों से मदद मिली और पास ही की जमीन लेकर वहां स्कूल बना दिया. जिसका नाम आनंद शिक्षा निकेतन है.
परिवार की वजह से ही ये संभव हो पाया
बाबर कहते हैं “मैं किसान परिवार से हूं. माता-पिता चाहते थे कि मैं पढ़ लिखकर सरकारी अधिकारी बनूं. लेकिन मुझे बच्चों को पढ़ाने में ही खुशी मिलती थी. इसमें मेरी मां ने सबसे पहले मेरा साथ देने की पहल की और उसके बाद पिताजी ने भी मेरी बात को समझा. इस तरह मेरे परिवार ने मेरा भरपूर साथ दिया. जिसके कारण ही ये स्कूल बनना संभव हो पाया है. स्कूल के शिक्षक और गांव के लोग साथ ही कई लोगों ने मेरी इस पहल में मेरा साथ दिया है.”
आनंद शिक्षा निकेतन में वर्तमान में 300 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं.
आनंद शिक्षा निकेतन में देते हैं मुफ्त शिक्षा
साल 2015 में आनंद शिक्षा निकेतन स्कूल की बिल्डिंग तैयार हो गई. 2016 से बाबर ने यहां पढ़ाना शुरु कर दिया. ये स्कूल उनके घर से तकरीबन 2 किमी दूर पर बना हुआ है. वो बताते हैं, “ बीते 20 सालों में 2002 से लेकर अब तक हमारे स्कूल से 7000 से ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर चुके हैं. वर्तमान में 300 से ज्यादा विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. आनंद शिक्षा निकेतन में बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ ही पढ़ने के लिए उपयोग में आने वाली सारी चीजें मुहैया करवाई जाती हैं. बच्चों को खेलकूद जैसी कई गतिविधियां करवाई जाती हैं.” वो स्किल डेवलपमेंट पर भी खासा ध्यान दे रहे हैं. धीरे-धीरे और भी बेहतर करने के प्रयास चल रहे हैं. उनके स्कूल से पढ़कर निकले हुए बच्चे भी इस शिक्षा की मुहिम में उनके साथ हैं. जो उनके स्कूल में बच्चों को शिक्षक बनकर पढ़ा रहे हैं. उनकी छोटी बहन अमीना खातून भी इस स्कूल में शिक्षक हैं और बच्चों को पढ़ा रही हैं.
अब तक मिल चुके हैं इतने सम्मान
बाबर अली के इस काम के चलते उन्हें अब तक कई सम्मान दिए जा चुके हैं. बीबीसी द्वारा उन्हें साल 2009 में वर्ल्ड यंगेस्ट हेडमास्टर का सम्मान दिया गया है. इसी के साथ साल 2012 में आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ में भी उनकी कहानी को दिखाया गया था. इसके बाद साल 2016 में उन्हें ‘फोर्ब्स मैगजीन’ ने स्पेशल 30 की श्रेणी में भी रखा. साल 2017 में उन्हें रोटरी इंटरनेशनल की ओर से इंडियन आइकॉनिक अवॉर्ड से भी नवाजा गया है.
वो स्वामी विवेकानंद को अपना प्रेरणास्त्रोत मानते हैं और उन्हें कई कार्यक्रमों और समारोहों में बुलाया जाता है. बाबर ने आर्ट्स से ग्रेजुएशन किया है. इसके साथ मास्टर्स इंग्लिश और हिस्ट्री से किया हुआ है.
शिक्षा के लिए देते हैं ये संदेश
बाबर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि किसी को शिक्षा मिलने के बाद उसका इस्तेमाल सिर्फ नौकरी पाने के लिए किया जाए. स्वामी विवेकानंद के अनुसार आपको एक अच्छा मनुष्य बनने के लिए शिक्षा की जरूरत होती है. वो कहते हैं भारत में बड़े-बड़े शिक्षा संस्थान हैं. हमारे यहां से कई विद्वान निकलते हैं. लेकिन हमें बच्चों की मूल्यों पर आधारित शिक्षा पर जोर देना चाहिए. जिससे कि बेहतर तरीके से सामाजिक विकास हो सके. जिससे देश की प्रगति और विकास की यात्रा ज्यादा बेहतर तरीके से हो पाएगी. पिछड़े इलाकों में जहां बहुत गरीबी है, गरीब तबके के वे लोग जो रोज कमाते और खाते हैं. जिसके कारण अपने बच्चों को नहीं पढ़ा पाते हैं. ऐसे में बच्चों को मजदूरी करनी पड़ती है. इस तरह के बच्चों की मदद कर उन्हें पढ़ाकर उनका जीवन सफल बनाना चाहिए.
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FIRST PUBLISHED : August 09, 2022, 17:11 IST