दास्तान-गो : एसडी बर्मन के किस्से उनसे जिन्हें आप नहीं जानते पर वे सचिन-दा को ख़ूब जानते हैं

Daastaan-Go ; Musician Sachin Dev Burman Death Anniversary : एक बार शक्ति सामंत साहब ने ‘बड़े साहब’ को मर्सिडीज़ दी. गाड़ी और उसकी चाभी वे ख़ुद घर पे रखकर गए. कहने लगे- दादा आपके लिए मेरी तरफ़ से तोहफ़ा है. मगर ‘बड़े साहब’ ने मना कर दिया. वे बोले- मुझे पसंद नहीं है ये गाड़ी. मेरे पास पहले से ही दो गाड़ियां हैं. कहां रखूंगा इसे. मुझे नहीं चाहिए. फिर भी चार-पांच दिन गाड़ी घर में रही. कि शायद ‘बड़े साहब’ मान जाएंगे. मैं ही उसे स्टार्ट कर के थोड़ा-बहुत आगे-पीछे कर लिया करता था. साफ़ कर देता था. दूसरे की अमानत थी न. मगर ‘बड़े साहब’ नहीं माने. गाड़ी लौटा दी’.

दास्तान-गो : एसडी बर्मन के किस्से उनसे जिन्हें आप नहीं जानते पर वे सचिन-दा को ख़ूब जानते हैं
दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…  ———– जनाब, हिन्दी फिल्मों के मशहूर मूसीक़ार (संगीतकार) सचिन देव बर्मन यानी एसडी बर्मन के बारे में तमाम बातें कही-सुनी जाती हैं. मसलन- वे ‘कंजूस’ इतने थे कि कोई घर आए तो उसे खाने-पीने के लिए भी पूछते नहीं थे. बल्कि ये पूछते थे कि तुम ‘खाना तो खाकर आए हो न?’ यहां तक कि कभी मंदिर जाते तो वहां बाहर अपनी दोनों चप्पलों या जूतों को अलग-अलग जगह रखा करते थे. ताकि कोई उन्हें चुरा न सके.  वे पान खाने के शौक़ीन थे. लेकिन किसी को खिलाते नहीं थे. और यह सब भी तब जबकि वे ख़ुद त्रिपुरा के राजघराने के राजकुमार थे. ऐसा और भी बहुत कुछ कहा जाता है उनके बारे में, जो पूरी तरह ग़लत न भी हो शायद. लेकिन मुकम्मल सच भी नहीं कह सकते इन बातों को. क्योंकि ये सिर्फ़ तस्वीर का एक पहलू बयां करती हैं. वह भी उन लोगों के हवाले से जो दिन, हफ्ते या महीने में कभी एक-दो बार ही ‘सचिन-दा’ से मिला-जुला करते थे. लिहाज़ा, सचिन-दा के साथ थोड़े-बहुत वक़्त में जिसका जैसा वास्ता पड़ा, उसने उनके बारे में उसी तरह का ख़्याल क़ायम कर लिया. उसकी चार जगह चर्चा की और क़िस्से चल पड़े. फिल्मों की दुनिया में वैसे भी गप-बाज़ी की अपनी एक जगह हुआ करती है. सो, कुछ वैसा ही मामला बना. मगर तभी मोती लालवानी जी इन क़िस्से-कहानियों के बीच में आ गए. हां, बीच में ही कहना चाहिए. क्योंकि मोती जी सचिन-दा के बड़े प्रशंसक होते हैं. सो इस नाते, उन्होंने इन कही-सुनी बातों का सच सामने लाने का बीड़ा उठाया. और अपनी सहयोगी ऋचा लखनपाल के साथ मिलकर उन तमाम लोगों को ढूंढ़ा, उनसे बातचीत की, जिन्होंने सचिन-दा के साथ ज़िंदगी का बड़ा वक़्त बिताया. जैसे उनके ड्राइवर वग़ैरा. लालवानी ने सचिन-दा के बारे में एक वेबसाइट बनाई है, ‘एसडीबर्मनडॉटनेट’ के नाम से. उस पर और उन्हीं के यू-ट्यूब चैनल पर 80 से ज़्यादा वीडियो हैं ऐसे लोगों के. ये लोग वे हैं, जिन्हें फिल्मों की दुनिया में ही बहुत से लोग नहीं जानते होंगे, तो बाहर किसी और की तो बात ही क्या. लेकिन ये सब लोग सचिन-दा को बहुत अच्छे से जानते थे. सो, आज 31 अक्टूबर को, जब सचिन-दा की पुण्यतिथि है, तो इस मौके पर क्या ये बेहतर नहीं होगा कि उनके बारे में इन्हीं लोगों में किसी की बताई बातों को सुना जाए? तो सुनते हैं. आज असलम से. ये सचिन-दा के बेटे ‘पंचम’ यानी राहुल देव बर्मन की कार चलाते थे. जबकि असलम के पिता ‘बड़े साहब’ यानी एसडी बर्मन की. कभी-कभी मौका पड़ता तो असलम सचिन-दा की भी गाड़ी चलाया करते थे. बताते हैं, ‘ज़्यादातर शाम के टाइम ही, पांच बजे के बाद बड़े साहब किसी के घर या कहीं मिलने-जुलने जाया करते थे. सुबह का वक़्त उनका अपना होता था. घर पर ही अच्छी तेल मालिश के बाद, लुंगी लपेटकर बरांडे में धूप सेंकते थे. फिर नारियल पानी पीना. और रियाज़ या रिहर्सल का वक़्त भी यही’. ‘धूप सेंकने के लिए उनके बैठने से पहले ही नारियल पानी उनकी जगह पर रखा होना ज़रूरी था. इसके बाद वहीं आराम करते हुए कोई किताब या मैगज़ीन पढ़ते थे. उस वक़्त ‘इंडियन एक्सप्रेस’ का ‘फ्री-प्रेस’ मैगज़ीन आया करता था. वह उन्होंने बहुत पसंद था. मैं वह मैगज़ीन ढूंढ-ढूंढकर लाया करता था उनके लिए. खार स्टेशन पर मिलता था वह. रिकॉर्डिंग ज़्यादातर दोपहर के बाद ही रखा करते थे. महबूब स्टूडियो जब एक बार बंद हो गया तो उसे ‘बड़े साहब’ ने ही शुरू कराया था. कहते थे- यहां के जैसी मशीनें किसी और जगह पर नहीं हैं. एक रोज शायद फिल्मिस्तान में, ‘अमर प्रेम’ पिक्चर (1972) के गाने रिकॉर्ड हो रहे थे. वहां शर्मिला टैगोर जी भी आ गईं. वहां रिकॉर्डिंग से पहले ‘बड़े साहब’ ने अपना पान का डिब्बा मेरे पास रखा दिया था. साफ कहा था- देखो असलम, हमरा डिब्बा पान का, किसी को देने का नईं. पहला हमसे इजाज़त लेने का. फिर देने का.’ ‘तभी शर्मिला जी आईं और मुझसे पान मांगने लगीं. लेकिन मैंने मना कर दिया तो वे नाराज़ हो गईं. कहने लगीं- बहुत बदतमीज़ आदमी हो. तुम्हें बात करने का शऊर नहीं है. वग़ैरा, वग़ैरा. उन्होंने ‘बड़े साहब’ से भी शिकायत की. तब ‘बड़े साहब’ ने मुझे अपने पास बुलाया शर्मिला जी से कहा- इसे मैंने मना किया था. वह मेरी इजाज़त के बग़ैर किसी को भी मेरा पान नहीं देगा. फिर उन्होंने मेरे हाथ से पान का डिब्बा लिया. उसमें एक पान ख़ुद खाया और दूसरा शर्मिला जी की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा- लो, अब खाओ पान. उनके पान में और कुछ नहीं, एक संतरे का छिलका, एक बड़ी इलायची, ज़रा सा चूना और एक छोटी बोटल में अस्ल ख़ुशबूदार गुलाब जल, वह छिड़का होता था बस. चौपाटी पर एक ख़ास पान की दुकान होती थी. वहां से उनका पान लगता था. उन पान वाले भइया को पता था. जैसे ही ‘बड़े साहब’ की गाड़ी उनकी दुकान के सामने लगती, वे पान बना देते थे’. ‘मुझे गाड़ी से उतरकर पान सिर्फ़ लाने होते थे. वे घर पर अपने लिए पान ख़ुद बनाते थे. उसमें कभी केवड़ा भी डालते थे. संतरे के छिलके को दो-दो, तीन-तीन दिन तक धूप में रखकर सुखाया करते थे. उनके सूख जाने के बाद उन्हें साफ़ कर के ‘माता जी’ (सचिन-दा की पत्नी मीरा देव) एक डिब्बी में भरकर रखा करती थीं. दूसरी डिब्बी में इलायची के दाने और चूना वग़ैरा भी. सब पान में डालने के लिए. शायद इसीलिए वे अपना पान किसी को देते नहीं थे. क्योंकि यह सब हर जगह मिलना मुश्किल होता है न? सुबह नाश्ते में मीठे चीकू, संतरे, केले के टुकड़े कटे हुए. ये सब होता था. इसके बाद पान खाते थे. और वो पान वाला, चौपाटी वाला. वह 15 रुपए लेता था, पान बनाने का, ‘बड़े साहब’ से. उसे वे पांच रुपया अलग से दिया करते थे. वो साहब के पांव को हाथ लगा के उनसे पांच रुपया लेकर रख लिया करता था. कहता था- दादा, इसको तो मैं ख़र्च नहीं करूंगा’. ‘ऐसे ही स्टूडियो में भी एक और थे. उनका दो रुपया फिक्स था. ‘बड़े साहब’ हमेशा दो रुपए का नोट उनको देते थे- राजू ये तुम्हारा. ऐसे काफ़ी लोग थे. किसी को दो, किसी को पांच, किसी को 10 रुपए. कुछ न कुछ देते ही रहते थे ‘बड़े-साहब’. उनके पर्स के लिए खुल्ले पैसों का इंतज़ाम भी ‘माता जी’ किया करती थीं. उनके घर के पास ही बैंक ऑफ़ इंडिया है. वहां से पैसे लाने के लिए अक़्सर मुझे भेजा करती थीं. इतना ही नहीं वे बच्चों की तरह हम लोगों का ख़्याल रखती थीं. एक वाक़ि’आ है. जब मैं शुरू-शुरू में काम पर लगा तो ‘बड़े साहब’ मुझसे बोले- असलम, बाबू (मेरे पिताजी) हमारे पास रहेगा, तुम सुर-मंदिर (सचिन-दा का दूसरा बंगला, जहां पंचम रहते थे) में जाओ. मैंने कहा- ठीक है. वहां मुझे एक महीना बीता. पगार का वक़्त आया. ‘माता-जी’ ने पगार मेरी, मेरे पिताजी को दे दी. मेरे पास आने-जाने का भी पैसा नहीं. पांच तारीख़ हो गई, सात तारीख़ हो गई’. ‘तब मैं साहब (आरडी बर्मन) के पास गया, तो उन्होंने पूछा- क्या बात है. मैंने कहा- साहब, पैसा  नहीं है. जाने-आने का भी पैसा नहीं है. पगार तो मिला नहीं अब तक. वे बोले- क्या बात करता है. रुक, रुक मैं पूछता हूं. अभी ये तो रख. उन्होंने कुछ पैसे दिए. फिर बाद में मुझे पता चला कि मेरी पगार तो मेरे पिताजी को दे दी गई है. क्योंकि ‘माताजी’ को लगता था कि तुम (यानी मैं) पैसा लोगे. तुम्हें कोई ख़राब लत लगा. या किसी ख़राब जगह जाओगे. तो, ऐसा नहीं करना. इसलिए मैं पगार बाबू को ही दूंगी. तो ऐसा था उनका. ऐसे ही, मैं पहले सिगरेट पीता था. एक बार मैं नीचे सिगरेट पी रहा था. गाड़ी का काम कर रहा था. साहब तो सो रहे थे. पर ‘माताजी’ को धुआं दिख गया तो वे नीचे उतरकर आईं. उन्होंने मुझसे पूछा- ये धुआं कहां से आ रहा है? अब मैं क्या बोलूं. मेरे हाथ में तो सिगरेट थी. उन्होंने देख ली तो खींचकर थप्पड़ लगाया मुझे. बोला- अभी तुम बहुत छोटे हो, फेंको इसे’. ‘इसके बाद ऊपर लेकर गईं. वहां बोलीं- मुंह धोओ, कुल्ला करो. फिर अपना पान लाकर मुझे दिया. उसमें थोड़ा सा 120 (तंबाकू) डाला. और बोली- ये खाओ. मैं बोला- इससे तो मुझे चक्कर आ जाएगा. तो कहने लगीं- नहीं आएगा, हल्की तंबाकू है. आज से यही खाना है. सिगरेट नहीं पीना. तब से मुझे भी लत लग गई पान की. मेरा दोपहर का खाना तो उन्हीं के यहां होता था. फिक्स था रोज़ाना. इसके अलावा कभी घर में कोई पार्टी या पूजा-पाठ या फिर कोई समारोह होता था, तो हम लोग साथ में ही खाते थे. सरस्वती देवी की पूजा (बसंत पंचमी) के दिन तो ‘बड़े साहब’ हम लोगों को अपने हाथ से परोसकर खाना खिलाते थे. काफ़ी लोग आया करते थे उस दिन ‘बड़े साहब’ के यहां. भजिया, बंगाली स्टाइल की खिचड़ी, ऐसे पकवान होते थे… और उनको अपनी ख़ुद्दारी, अपनी इमेज़ का भी ख़्याल रहता था हर वक़्त. इस क़िस्म के दो वाक़ि’अे याद हैं मुझे बहुत अच्छी तरह’. ‘एक बार रफ़ी-साहब (मोहम्मद रफ़ी) किसी गाने के लिए पैसा नहीं ले रहे थे. उनका कहना था- दादा, आपने बुलाया. मुझे बड़े वक़्त के बाद गाने का मौका दिया. यही मेरे लिए बहुत है. लेकिन ‘बड़े साहब’ बोले- नहीं रफ़ी, तुम पैसे लो. मेरी इमेज़ का सवाल है. तब उन्होंने शक्ति सामंत साहब को फोन करके उन्हें पैसे दिलवाए. इसी तरह, एक बार शक्ति सामंत साहब ने ‘बड़े साहब’ को मर्सिडीज़ दी. गाड़ी और उसकी चाभी वे ख़ुद घर पे रखकर गए. कहने लगे- दादा आपके लिए मेरी तरफ़ से तोहफ़ा है. मगर ‘बड़े साहब’ ने मना कर दिया. वे बोले- मुझे पसंद नहीं है ये गाड़ी. मेरे पास पहले से ही दो गाड़ियां हैं. कहां रखूंगा इसे. मुझे नहीं चाहिए. फिर भी चार-पांच दिन गाड़ी घर में रही. कि शायद ‘बड़े साहब’ मान जाएंगे. मैं ही उसे स्टार्ट कर के थोड़ा-बहुत आगे-पीछे कर लिया करता था. साफ़ कर देता था. दूसरे की अमानत थी न. मगर ‘बड़े साहब’ नहीं माने. गाड़ी लौटा दी’. तो जनाब, ये कुछ मुख़्तलिफ़ पहलू थे, सचिन-दा की शख़्सियत के. यक़ीनी तौर पर ये अब तक ज़्यादा चर्चा में नहीं रहे. क्योंकि इस क़िस्म की सच्ची और अच्छी बातें सुर्खियों में कम ही रहा करती हैं. पर ‘दास्तान-गो’ की दास्तान तो सच्चे वाक़ि’ओं से ही बनती है न. इसलिए इन बातों ने यहां जगह पाई है. ऐसी और भी बहुत सी बाते हैं. उन पर फिर कभी रोशनी डालेंगे. आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़. ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें up24x7news.com हिंदी| आज की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट, पढ़ें सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट up24x7news.com हिंदी| Tags: Death anniversary special, Hindi news, up24x7news.com Hindi OriginalsFIRST PUBLISHED : October 31, 2022, 08:30 IST