दास्तान-गो: ‘मुक़द्दर का सिकंदर’ नेपोलियन बोनापार्टऔर उनका मुक़द्दर उन्होंने ख़ुद लिखा था!
दास्तान-गो: ‘मुक़द्दर का सिकंदर’ नेपोलियन बोनापार्टऔर उनका मुक़द्दर उन्होंने ख़ुद लिखा था!
Daastaan-Go ; Napoleon Bonaparte-Soldier of Destiny : लिहाज़ा, इमैनुअल ने नेपोलियन को अपने भरोसे में लिया और उनकी मदद से ‘डायरेक्टरी’ के ख़िलाफ़ फ़ौजी बग़ावत करा दी. वह तारीख़ थी आठ और नौ नवंबर 1799 की. बताते हैं, तब नेपोलियन की बेगम जोसेफीने (इन्हें जोसेफ़ाइन भी कहते हैं) ने भी अहम किरदार अदा किया था. उन्होंने ‘डायरेक्टरी’ के पांचों मौज़ूदा डायरेक्टरों को इस वादे के साथ अपने साथ उलझाकर रखा कि वे उनके साथ रात गुज़ारेंगी. बला की ख़ूबसूरत थीं, सो सब ‘डायरेक्टर-साहब’ उनके असर में आ गए और फ़ौजी-तख़्तापलट रोकने के लिए कोई बंदोबस्त न कर सके. इस तरह, खून का एक क़तरा भी बहाए बिना फ्रांस का निज़ाम बदल गया.
दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…
———–
जनाब, दुनियाभर में कुछ चुनिन्दा तारीख़ी-शख़्सियतें ही हैं, जिनका ज़िक्र बार-बार, हर बार किया जाता है. वज़ह कैसी या कोई भी हो, लेकिन इन शख़्सियतों को कभी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सका. और ऐसी ही शख़्सियतों में एक नाम है नेपोलियन बोनापार्ट (पहले). दुनिया उन्हें ‘फ्रांस के तानाशाह’ की तरह देखती है. मगर फ्रांस में अब भी एक बड़ा तबक़ा है, जो इन्हें इज़्ज़त की नज़र से देखता है. क्योंकि इन्होंने अपने दौर में ऐसे कई काम किए, जिनके बारे में तब सोचना भी मुमकिन न था. और आज भी उनके किए कामों का असर फ्रांस के समाजी-हल्क़ों में देखा जाता है. फ्रांस की सेना में उन्हें मोहब्बत करने वाले फ़ौजी अब तक पाए जाते हैं क्योंकि वही थे, जिनकी अगुवाई में फ्रांसीसी फ़ौज ने यूरोप के नक़्शे पर नई इबारत लिख दी थी. बल्कि दुनिया के नक़्शे पर कहना चाहिए. यहां तक कि दुश्मन-फ़ौज भी इनकी क़सीदा-गोई किया करती थी.
यक़ीन न आए तो क़रीब-क़रीब पूरी दुनिया में अपना निज़ाम क़ायम करने वाली ताक़तवर ब्रिटिश-सल्तनत के एक असरदार फ़ौजी ‘ड्यूक ऑफ वेलिंगटन’ आर्थर वेलेज़्ली के बयान पर ग़ौर फ़रमाएं. ये वेलेज़्ली ही थे, जिनकी अगुवाई में ब्रिटिश और फ्रांसीसी फ़ौजों के बीच हुए मुक़ाबले में नेपोलियन को आख़िरी तौर पर शिक़स्त दे दी गई थी. आज के नीदरलैंड में एक जगह है वाटरलू. वहीं पर. साल था 1815 का और तारीख़ 18 जून. अलबत्ता, इन्हीं ‘ड्यूक ऑफ़ वेलिंग्टन’ ने कभी फ़रमाया था, ‘जंग के मैदान में नेपोलियन अकेले ही 40,000 लड़ाकों के बराबर पाए जाते हैं’. इन्हीं नेपोलियन के बारे में, ऐसा भी कहते हैं कि वे दुनिया की उन चुनिन्दा शख़्सियतों में शुमार पाए जाते हैं, जिन पर सबसे ज़्यादा क़िताबें लिखी गईं. और लिखी गईं, तो यक़ीनन उनके बारे में सबसे ज़्यादा पढ़ा भी गया, उनके बारे में दिलचस्पी दिखाई गई, ऐसा तो कहा ही जा सकता है.
हालांकि, इन्हीं नेपोलियन को ‘मुक़द्दर का सिकंदर’ कहने वाले भी तमाम लोग हैं. अभी कुछ बरस पहले, शायद 2015 में, माइकल ब्रोअर्स ने एक किताब लिखी थी. उस किताब का नाम ही दिया था, ‘नेपोलियन : सोल्जर ऑफ़ डेस्टिनी’. ब्रोअर्स साहब अंग्रेज हैं. तारीख़ी किताबें लिखा करते हैं. उनके जैसे और भी लोग हैं, जिन्होंने नेपोलियन के बारे में इस तरह की राय क़ायम की हुई है. और उनकी इस राय के पीछे शायद ख़ुद नेपोलियन की कही एक बात हो सकती है. वे कहा करते थे, मानते भी थे, ‘मेरा मुक़द्दर मेरी क़िस्मत तय करेगा’. पर जनाब, नेपोलियन की ज़िदगी के कुछ सुर्ख़ियों में रहे पहलुओं से एक बार कोई गुज़रकर तो देखे. यक़ीन जानिए, वह ये मानकर ही ठहरेगा कि नेपोलियन ने अपना मुक़द्दर ख़ुद लिखा था. अपने इरादे से, अपनी कारसाज़ियों से. वरना तो क्या मज़ाल कि एक आम इंसान बादशाह बनने का ख़्वाब देखे और बन भी जाए.
जी जनाब, आम इंसान ही तो थे नेपोलियन, अपनी पैदाइश के वक़्त. फ्रांस में एक टापूनुमा जगह बताई जाती है कोर्सिका. वहीं अजासियो क़स्बे में 15 अगस्त 1769 को जो नेपोलियन पैदा हुआ, वह एक वकील कार्लाे मारिया डि बोनापार्ट का बेटा था. मां मारिया लैटीज़िया रैमोलीनो भी घरेलू औरत ही थीं. इस बोनापार्ट ख़ानदान की जड़ें इटली के लिगुरियन तट की रिहाइश में कहीं पाई गईं थीं. और कोर्सिका टापू भी इटली के ही क़ब्ज़े में होता था पहले. लेकिन नेपोलियन के दादे-परदादे कभी कोर्सिका में आकर बस गए थे. फिर साल 1768 में इस इलाक़े पर भी फ्रांस का कब्ज़ा हो गया. यानी अपनी पैदाइश से महज़ एक साल पहले नेपोलियन इतालवी से फ्रांसीसी हुए थे. सीधे फ्रांस के राजा बनने के लिए. क्योंकि उम्र के महज नौवें पड़ाव से ही इन्होंने आगे बढ़ने की जो रफ़्तार पकड़ी, उस पर फ्रांस की शाही गद्दी तक पहुंचकर ही थोड़ा ठहराव आया था.
नेपोलियन ने जब फ्रांस के ब्रिएन शहर के फ़ौजी स्कूल में दाख़िला लिया, तब उन्हें फ्रेंच ज़बान बोलनी तक नहीं आती थी. लेकिन वे समझते बहुत कुछ थे. शायद अपना मुस्तक़बिल भी. क्योंकि उस दौर में ‘शाहाना ख़ानदानों’ के बच्चे इस फ़ौजी स्कूल में घुड़सवार-फ़ौज का हिस्सा होने की ख़्वाहिश रखा करते थे. उसमें शामिल होना अपनी शान समझते थे. मगर तब कोर्सिका का ये लड़का नेपोलियन तोपख़ाने वाली टुकड़ी में शामिल होने के मंसूबे बांध रहा था. उसकी पढ़ाई कर रहा था. तारीख़ी किताबें पढ़ा करता था. उनमें से भी जूलियस सीज़र, सिकंदर-महान, ऑगस्टस जैसे लड़ाकों, बादशाहों की ज़िंदगी के क़िस्से-कहानियां, ख़ास तौर पर पढ़ता था. वह जानता हो गोया, कि आने वाले वक़्त में यही सब उसके काम आने वाला है. मुमकिन है, इसी तरह की पढ़ाई ने छोटी उम्र में ही उसकी शख़्सियत में एक अगुवा, एक रहनुमा की ख़ासियतें भर दी थीं.
तभी तो, साल 1785 में जब नेपोलियन के वालिद का इंतिक़ाल हुआ तो उन्होंने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली. मां, तीन भाई, दो बहनों का परिवार. और दिलचस्प ये कि इस परिवार में सबसे बड़े नहीं थे नेपोलियन. फिर भी उन्होंने परिवार के मुखिया की हैसियत पर ख़ुद को ला खड़ा किया. मानो ख़ुद पर यह एक तजरबा था उनका. जिसके मार्फ़त पूरे मुल्क़ तो क्या, दुनिया के बड़े हिस्से की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेने के लिए ख़ुद को तैयार करना था उन्हें. उम्र इस वक़्त 16 बरस भी पूरी नहीं हुई थी और पढ़ाई भी अधूरी थी. उनके वालिद के इंतिक़ाल का यह वाक़ि’आ फरवरी महीने में पेश आया था. जबकि पेरिस की फ़ौजी अकादमी में उसी साल अगस्त-सितंबर के महीने में सालाना इम्तिहान होने वाले थे. वह भी दिए उन्होंने. और 58 लाेगों की कक्षा में 42वें नंबर पर आए. फ़ौज में नौकरी मिल गई. सेकेंड लेफ़्टिनेंट का ओहदा मिला.
फ़ौज में ये जो शुरुआती ओहदा था, वह दूसरे फ़ौजियों को तोपख़ाने की ट्रेनिंग देने का था. लेकिन इस और ऐसे ओहदों पर ठहर जाना नेपोलियन को मंज़ूर न था. सो, वे पढ़ते रहे. उन्होंने वॉल्तेयर को पढ़ा, जिन्होंने 17वीं, 18वीं सदी में एक वक़्त पर अपनी सोच, अपनी बातों, अपनी लेखनी से फ्रांस ही नहीं, पूरे यूरोप के समाजों को हिलाकर रख दिया था. लोगों को बड़े समाजी-बदलावों की तरफ़ धकेला था. ऐसे ही नेपोलियन ने रूसो को पढ़ा. ये भी वाल्तेयर जैसे ही थे. उन्हीं की तरह सोचने, लिखने, पढ़ने और बोलने वाले. जर्मन थे लेकिन असर पूरे यूरोप पर रखते थे. इनका दौर भी वही था, 18वीं सदी का. यानी ऐसी शख़्सियतों ने अब तक नेपोलियन को पूरी तरह अपने असर में ले लिया था. वे भी तैयार थे. बस, एक मौके का इंतिज़ार कर रहे थे. और ये मौका बना साल 1788 के आस-पास, जब फ्रांस में इंक़िलाब की चिंगारी ने असर दिखाना शुरू किया.
इस वक़्त तक नेपोलियन क़रीब दो साल से अपने घर में थे. कोर्सिका में. कहते हैं कि उन्हें घर की बहुत याद आ रही थी, इसलिए उन्होंने सितंबर 1786 में फ़ौज से लंबी छुट्टी ले ली थी. लेकिन जैसे ही मुल्क में इंक़िलाब की सुगबुगाहट शुरू हुई, वे ख़ुद को घर की महफ़ूज़ चार-दीवारी में क़ैद कर के नहीं रख सके. उन्हें आगे बढ़ना था. रहनुमाई करनी थी, जो उन्होंने की भी. जून 1788 में वे फिर फ़ौज का हिस्सा बने और फिर उससे दूर नहीं हुए. बल्कि उसके अज़ीज़ होते गए. महज़ 24 साल की उम्र तो वह फ्रांसीसी फ़ौज में ब्रिगेडियर जनरल जैसे ऊंचे ओहदे पर पहुंच चुके थे. बाहरी लड़ाईयों में एक के बाद एक मिल रही जीत उनके हक़ में जा रही थी. और तख़्त-ओ-ताज़ के लिए मुल्क के भीतर चल रही लड़ाईयों पर उनकी पूरी नज़र बनी हुई थी. बल्कि वे ख़ुद भी इन सियासी दांव-पेंच का हिस्सा बने हुए थे कहीं-कहीं, किसी-किसी के ज़रिए से.
फ्रांस की ‘अवाम इस वक़्त राजशाही के रवैये से ‘आजिज़ आ चुकी थी. वह पुर-ज़ोर आवाज़ बलंद कर रही थी कि उसकी जगह जमहूरी-निज़ाम (लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था) लाया जाए. भले वह रस्मी तौर पर राजा के मातहत रहे. उसकी इसी मंशा के मुताबिक, 1789 में ही नेशनल असेंबली ने ऐसा कुछ बंदोबस्त भी कर दिया था. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए नवंबर 1795 में ‘चुने हुए’ पांच जनों की कमेटी बना दी गई थी, जो मुल्क पर हुक़ूमत किया करती थी. इस कमेटी को ‘डायरेक्टरी’ कहा जाता था. इसी डायरेक्टरी में एक असरदार शख़्सियत होते थे इमैनुअल सीस. शुरू से ही उन्हें इस ‘डायरेक्टरी’ का हिसाब-किताब जंच नहीं रहा था. हालांकि जमहूरियत के तलबग़ार वे भी थे. पर वे मौके की तलाश में थे, कि कब इसे बदलकर नया बंदोबस्त करें. अब तक नेपोलियन की बहादुरी, उनकी जीतों और फ़ौज में उनकी मशहूरियत आसमान छूने लगी थी.
लिहाज़ा, इमैनुअल ने नेपोलियन को अपने भरोसे में लिया और उनकी मदद से ‘डायरेक्टरी’ के ख़िलाफ़ फ़ौजी बग़ावत करा दी. वह तारीख़ थी आठ और नौ नवंबर 1799 की. बताते हैं, तब नेपोलियन की बेगम जोसेफीने (इन्हें जोसेफ़ाइन भी कहते हैं) ने भी बड़ा अहम किरदार अदा किया था. उन्होंने ‘डायरेक्टरी’ के पांचों मौज़ूदा डायरेक्टरों को इस वादे के साथ अपने साथ उलझाकर रखा कि वे उनके साथ रात गुज़ारेंगी. बला की ख़ूबसूरत थीं, सो सब ‘डायरेक्टर-साहब’ उनके असर में आ गए और फ़ौजी-तख़्तापलट रोकने के लिए कोई बंदोबस्त न कर सके. इस तरह, खून का एक क़तरा भी बहाए बिना फ्रांस का निज़ाम बदल गया. तख़्त-ओ-ताज़ का हक़दार चेहरा बदल गया. क्योंकि इस वाक़ि’अे के बाद फ्रांस में न कोई ‘डायरेक्टर-साहब’ नज़र आए और न इमैनुअल ही. दिखे तो सिर्फ़ नेपोलियन, जो अपने हाथ से अपना मुक़द्दर लिख चुके थे.
आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.
ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें up24x7news.com हिंदी| आज की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट, पढ़ें सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट up24x7news.com हिंदी|
Tags: Hindi news, up24x7news.com Hindi OriginalsFIRST PUBLISHED : November 09, 2022, 09:40 IST