दास्तान-गो : मंगल पांडे यानी हिन्दुस्तान में 1857 की बग़ावत की ‘पहली चिंगारी’
दास्तान-गो : मंगल पांडे यानी हिन्दुस्तान में 1857 की बग़ावत की ‘पहली चिंगारी’
Daastaan-Go ; Mangal Pandey Birth Anniversary : बस, यहीं अंग्रेज बाबू से ग़लती हो गई शायद. मंगल पांडे अब तक भरी हुई बंदूक के साथ क्वार्टर गार्ड की इमारत की आड़ ले चुके थे. उन्होंने वहीं से हेनरी बाफ़ पर गोली चला दी. अपने साथियों से वादा किया था मंगल पांडे ने, कि जो पहला अंग्रेज सामने आएगा, आज उनके हाथ से मारा जाएगा. उसी वादे के मुताबिक काम किया उन्होंने. हालांकि पहली बार में निशाना चूक गया. घोड़े को गोली लगी और वह सवार के साथ ज़मीन पर आ गिरा.
दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…
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जनाब, एक सवाल अगर पूछा जाए कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ साल 1857 की बग़ावत की पहली चिंगारी कब फूटी? किस तारीख़ को? तो तारीख़ी जानिब से क़रीब-करीब सभी लोग एक जवाब दिया करेंगे, 29 मार्च 1857, जब बंगाल की बैरकपुर छावनी में सिपाहियों ने बग़ावत की. सही भी है. लेकिन इस जवाब का दूसरा पहलू भी हो सकता है. और उस पहलू की जानिब से तारीख़ 19 जुलाई 1827 भी कही जा सकती है. क्योंकि यही तारीख़ थी, जब हिन्दुस्तानी सिपाही मंगल पांडे की पैदाइश हुई. वह मंगल पांडे, जो अस्ल में ख़ुद, 1857 की बग़ावत की ‘पहली चिंगारी’ साबित हुए. वह मंगल पांडे, जिन्होंने बैरकपुर छावनी की बग़ावत की अगुवाई की. वह मंगल पांडे, जिनकी बंदूक से निकली चिंगारी (गोलियों) ने उस वक़्त अंग्रेजी अफ़सरों को सबसे पहले ज़द में लिया. और इसके कुछ वक़्त बाद हजारों हिन्दुस्तानी लड़ाकों ने अंग्रेजों को अपनी ताक़त का एहसास कराया.
वैसे, इस दूसरी तारीख़, मंगल पांडे की पैदाइश वाली में जगह के बाबत कुछ भरम हैं. कहीं कोई किताबें बताया करती हैं कि मंगल पांडे की पैदाइश मौज़ूदा उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के गांव नगवा में हुई थी. जबकि कुछ का कहना है कि उनकी पैदाइश इसी सूबे के अकबरपुर में हुई. ये क़स्बा आज के अयोध्या जिले में पड़ता है. इन दो के अलावा एक कहन तीसरी भी है. उसकी मानें तो मंगल पांडे बुंदेलखंड के ललितपुर में पैदा हुए. अलबत्ता, सरकारी दस्तावेज़ पहली वाली बात को सही मानते हैं. अभी एक बरस पहले यानी 2021 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने ट्विटर पर एक वीडियो जारी किया था. तारीख़ थी आठ अप्रैल की, जिस दिन मंगल पांडे को बग़ावत के ज़ुर्म में अंग्रेजों ने फ़ांसी पर चढ़ा दिया था. तो उस रोज़ जारी सरकार के वीडियो में मंगल पांडे की पैदाइश की जगह नगवा को बताया गया था. लिहाज़ा, सरकार की बात को ही सही मानना बेहतर.
हालांकि, इससे आगे का जो क़िस्सा है, उसमें ज़्यादा भरम नहीं. मसलन- मंगल पांडे हिन्दू बिरहमन ख़ानदान में पैदा हुए. पिता दिवाकर पांडे खेती-किसानी किया करते थे और मां अभयरानी घर संभाला करती थीं. घर में हिन्दू मज़हब के रस्म-ओ-रिवाज सख़्ती से अमल में लाए जाते थे. ज़ाहिर तौर पर बचपन से ही इस क़िस्म क़ाइदों से मंगल पांडे की वाबस्तगी हो गई थी. इन्हें वे दिल-ओ-दिमाग पर कोई बोझ भी नहीं मानते थे. थोड़े बड़े हुए, यही कोई 21-22 बरस के, तो फ़ौज में नौकरी लग गई. ये बात है 1849 की. उस दौर में अंग्रेजों ने अपनी फ़ौज में हिन्दुस्तानियों के लिए अलग पलटन बना रखी थी. उसी में एक होती थी, ‘34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री’. मंगल पांडे सिपाही के ओहदे पर वहीं तैनात हुए. यहां शुरू-शुरू में तो सब ठीक रहा. लेकिन दिक़्क़त तब हुई, जब 1855 के आस-पास अंग्रेजों ने नई बंदूकें फ़ौज में शामिल कीं. एनफील्ड-53 नाम था इन बंदूकों का.
नई बंदूकों के लिए नए कारतूस आए, जो बवाल की जड़ बने. नए कारतूसों पर ख़ास तरह की परत होती थी. उसे मुंह से छीलकर कारतूस को बंदूक में भरना पड़ता था. इन कारतूसों के बाबत फ़ौज में यह ख़बर फैली कि इन पर जो परत है, वह गाय और सुअर के मांस की चर्बी से बनी है. ये भी कि अंग्रेजों ने जानकर ये बंदोबस्त किया है, ताकि हिन्दुओं और मुसलमानों को उनके मज़हब से हटाया जा सके. ग़ौर फ़रमाते चलें कि हिन्दू क़ौम गाय के मांस से परहेज़ किया करती है. जबकि मुसलमानों को सुअर के मांस से दिक़्क़त होती है. सो, अंग्रेजों के साथ काम करने वाले दोनों ही क़ौम के फ़ौजी इस ख़बर से बेचैन, परेशान हुए जाते थे. कि तभी, दो वाक़िये हो गए. पहला वाक़िया इस तरह हुआ कि ‘34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री’ में एक अफ़सर आए कर्नल एस व्लीलर. वे ईसाइयत के पक्के मानने वाले थे. वे साथी फ़ौजियों को भी उसे मानने, अपनाने के लिए कहने लगे.
दूसरा यूं हुआ कि ‘56वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री’ के एक अफ़सर कैप्टन विलियम हॉलीडे की बेगम ने ईसाइयों की पाक-किताब ‘बाइबिल’ को फ़ौजियों के बीच बंटवाना शुरू कर दिया. अंग्रेजों ने इस किताब का ख़ास तौर पर हिन्दी और उर्दू ज़बान में तर्जुमा (अनुवाद) कराया था. वही हिन्दुस्तानी फ़ौजियों को बांटी जा रही थीं. ताकि वे अपनी ज़बान में वह सब समझ सकें, जो ‘बाइबिल’ में लिखा है. हालांकि अंग्रेजों की इस कोशिश को हिन्दुस्तानी फ़ौजियों ने यूं समझा कि अंग्रेज उनका मज़हब उनसे छीन लेने के इंतज़ाम कर रहे हैं. कारतूस का मसला तो पहले से था ही. बस, फिर क्या था. आग में घी पड़ गया गोया. और इस आग ने सबसे पहले जिसे ज़द में लिया, वे थे मंगल पांडे. उनके लिए अब हालात बर्दाश्त से बाहर थे. वह 29 मार्च की तारीख़ थी. साल 1857 की. बेचैनी के आलम में, मंगल पांडे छावनी में बैरक के बाहर टहल रहे थे. गुस्सा क़ाबू से बाहर हो रहा था.
दोपहर का वक़्त था. बताते हैं, मंगल पांडे मैदान में टहलते हुए अपने साथी फ़ौजियों को आवाज़ें लगा रहे थे, ‘बाहर आओ. हथियार उठाओ. नहीं तो ये अंग्रेज हमें काफ़िर (विधर्मी) बनाकर छोड़ेंगे’. उन्हें इस हाल में देखकर किसी ने ऊपर के अफ़सरों को ख़बर दे दी. इन अफसरों में एक थे, सार्जेंट-मेजर जेम्स ह्यूसन. दूसरे थे- लेफ्टिनेंट हेनरी बाफ़. आनन-फ़ानन में थोड़े से वक़्त के फ़ासले पर दोनों ही छावनी पहुंचे. ह्यूसन ने पहले सिपाहियों से ऊंचे ओहदे वाले हिन्दुस्तानी अफ़सर जमादार ईश्वरी प्रसाद को बुलाया. उन्हें हुक़्म दिया कि तुरंत मंगल पांडे को गिरफ़्तार कर लें. लेकिन ईश्वरी प्रसाद ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. ये कहकर कि मंगल पांडे के सिर पर खून सवार है. वे अकेले उसे नहीं पकड़ सकते. कोई दूसरा सिपाही इस काम में उनकी मदद के लिए तैयार नहीं होगा. उधर, घोड़े पर सवार हेनरी बाफ़ अकेले ही, सीधे मंगल पांडे को क़ाबू करने जा पहुंचे.
बस, यहीं अंग्रेज बाबू से ग़लती हो गई शायद. मंगल पांडे अब तक भरी हुई बंदूक के साथ क्वार्टर गार्ड की इमारत की आड़ ले चुके थे. उन्होंने वहीं से हेनरी बाफ़ पर गोली चला दी. अपने साथियों से वादा किया था मंगल पांडे ने, कि जो पहला अंग्रेज सामने आएगा, आज उनके हाथ से मारा जाएगा. उसी वादे के मुताबिक काम किया उन्होंने. हालांकि पहली बार में निशाना चूक गया. घोड़े को गोली लगी और वह सवार के साथ ज़मीन पर आ गिरा. इतने में बाफ़ ने फुर्ती से अपने आप को बचाते हुए अपनी पिस्तौल से ज़वाबी गोली चलाई. लेकिन वह भी बेकार गई. तब तक मंगल पांडे तलवार लेकर खुले मैदान में आ चुके थे. उन्होंने बड़ी तेजी से सीधे बाफ़ पर हमला बोल दिया था. बाफ़ अपनी तलवार निकाल पाते कि तब तक मंगल पांडे बाफ़ को घायल कर चुके थे. इस फ़साद की ख़बर दफ़्तर में जेम्स ह्यूसन को मिल चुकी थी. वे भी अब तक मौके पर आ चुके थे.
ह्यूसन अपनी बंदूक से जब तक मंगल पांडे पर निशाना लगाते कि उन पर भी हमला बोल दिया गया. बंदूक के पिछले हिस्से से मारकर पांडे ने ह्यूसन को नीचे गिरा दिया. इस बीच, हिन्दुस्तानी फ़ौजियों में एक सिपाही शेख पलटू लगातार मंगल पांडे को पकड़ने की कोशिश कर रहा था. जबकि बैरक से निकलकर मैदान में आ चुके बाकी सिपाही पलटू पर पत्थरों और जूतों की बरसात कर रहे थे. ताकि वह मंगल पर अपनी पकड़ न बना सके. उधर, ऊपर के अफ़सरों को इस बारे में ख़बरें दी जा चुकी थीं. कंपनी के कमांडिंग अफ़सर जनरल हियरसे दो अंग्रेज अफ़सरों के साथ छावनी में आ चुके थे. वे सब मिलकर अब मंगल पांडे को क़ाबू में करने की कोशिश कर रहे थे. यह देख मंगल पांडे को जब लगा कि वे गिरफ़्तार किए जा सकते हैं या उन्हें गोली मारी जा सकती है, तो उन्होंने अपनी ही बंदूक से ख़ुदकुशी करने की कोशिश की. इससे वे घायल हुए पर जान नहीं गई.
मंगल पांडे गिरफ़्तार हो चुके थे. हफ़्ते भर में ही उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाकर उन्हें फ़ांसी की सज़ा सुना दी गई. उनकी मदद के ज़ुर्म में जमादार ईश्वरी प्रसाद को भी फ़ांसी की सज़ा सुनाई गई. तारीख़ मुक़र्रर हुई कि मंगल पांडे को 18 और प्रसाद को 21 अप्रैल को फ़ांसी दी जाएगी. लेकिन अंग्रेजों को डर लगा कि मंगल पांडे को इतने दिन ज़िंदा रखा तो दूसरे फ़ौजी भी बग़ावत न कर दें कहीं. लिहाज़ा उन्हें आठ अप्रैल को ही फ़ांसी पर चढ़ा दिया गया. प्रसाद की फ़ांसी की तारीख़ वही रही. अंग्रेजों की मदद करने वाले शेख़ पलटू को तरक़्क़ी दे दी गई. उसे हवलदार बना दिया गया. हालांकि पड़ताल आगे जारी रही. इसमें पाया गया कि पलटन के क़रीब-क़रीब सभी हिन्दुस्तानी फ़ौजी मंगल पांडे का साथ दे रहे थे. लिहाज़ा, ‘34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री’ ख़त्म कर दी गई. बतौर सजा. तारीख़ थी, छह मई 1857 की. हालांकि, इन्फेंट्री ख़त्म होती, उससे पहले, बताते हैं, शेख पलटू को भी किसी ने ख़त्म कर दिया. मगर बग़ावत का सिलसिला जो शुरू हुआ, वह ख़त्म न हो सका.
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(नोट : इस दास्तान के लिए मदद उन सरकारी दस्तावेज़ से भी ली गई है, जिनमें बैरकपुर छावनी में हुई बग़ावत की जांच की जानकारियां और उस मामले से जुड़े बयान वग़ैरा दर्ज़ हैं.)
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Tags: Birth anniversary, Hindi news, Mangal Pandey, up24x7news.com Hindi OriginalsFIRST PUBLISHED : July 19, 2022, 08:49 IST